Sunday, April 12, 2009

पुनर्जागरण के सूत्रपात के साथ एक नए वैज्ञानिक युग का प्रारम्भ हो रहा था।

आर्यभट द्वारा की गई ग्र्रहण की व्याख्या भी परवर्ती ज्योतिषविदों द्वारा अस्वीकार कर दी गई। पृथ्वी के भ्रमण के उनके सिद्धान्त को गोविन्दस्वामी ने 'मिथ्या ज्ञान' कहा और वराहमिहिर ने 'भ्रमति भ्रमस्थितेव' कहते हुए उसे अग्राह्म कर दिया। यहीं नहीं अप्पय दीक्षित (१५३०-१६००) जैसे सुप्रसिद्ध व्याकरणाचार्य ने कहा - 'आर्यभटघभिमत्‌ भूभ्रमणादिवादानां श्रुति न्याय विरोधेन हेयत्वात अर्थात्‌ - पृथ्वी के भ्रमण सम्बन्धी आर्यभट के सिद्धान्त शास्त्रों के विरुद्ध हैं, अतः निन्दनीय है।जब भारत में अप्पयदीक्षित जैसे विद्वान आर्यभट के सिद्धान्तों को हेय बतला रहे थे तब उधर पच्च्िचम में पुनर्जागरण के सूत्रपात के साथ एक नए वैज्ञानिक युग का प्रारम्भ हो रहा था।

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