Thursday, April 9, 2009

चन्द्रग्रहण के अवसर पर पृथ्वी की बड़ी छाया चन्द्रमा को ढक लेती है।

आर्यभट प्रथम भारतीय गणितज्ञ हैं, जिन्होंने यह मान दच्चमलव के बाद चार अंकों तक शुद्ध ज्ञात किया। इस मान को भी वे आसन्न (ंचचतवगपउंजम) कहते हैं।(४) उन्होंने ३० ४५÷ के अन्तर पर ज्यासारणियाँ विकसित की।(५) उन्होंने प्रतिपादित किया कि पृथ्वी अपने अक्ष पर पूर्व से पच्च्िचम की ओर घूमती है।(६) उन्होंने ग्रहण के लिए प्रचलित राहु-केतु की मान्यताओं को नकारते हुए, सूर्य तथा चन्द्रग्रहण की सही गणितीय व्याख्या प्रस्तुत की - छादयति शच्ची सूर्य शच्चिं महती च भूच्छाया - सूर्यग्रहण के अवसर पर सूर्य को चन्द्रमा ढक लेता है और चन्द्रग्रहण के अवसर पर पृथ्वी की बड़ी छाया चन्द्रमा को ढक लेती है। उनके कई क्रान्तिकारी एवं मौलिक निष्कर्षों के लिए, आर्यभट के उत्तराधिकारियों ने, विच्चेषकर ब्रह्मगुप्त ने उनकी निन्दा भी की है। ब्रह्मगुप्त ने लिखा है - आर्यभटो जानाति ग्रहाष्टगतिं यदुक्तवांस्तदसत (यह जो कहा है कि आर्यभट आठ ग्रहों की गति को जानता है, वह ठीक नहीं है।)

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