Thursday, December 18, 2008

प्राचीन भारतीय गणित की चर्चा बिना शुल्ब सूत्रों के अधूरी रहेगी

प्राचीन भारतीय गणित की चर्चा बिना शुल्ब सूत्रों के अधूरी रहेगी। शुल्ब सूत्र वैदिक समय (बण्१५०० दृ ब२००ठब्द्ध के साहित्य से सम्बन्ध रखते हैं। शुल्ब सूत्र जैसा कि नाम से स्पष्ट है नापने के नियम। यह बड़ा ही रोमांचित है कि लम्बाई रस्सी से नापी जाती थी इसलिए शुल्ब शब्द को रस्सी के लिए प्रयोग होने लगा। सूत्रों का प्रादुर्भाव वेदों से है तथा वे क्राइस्ट के जन्म से कम से कम आठ नौ शताब्दी पूर्व ज्ञात थे।
बोधायन प्रथम ज्यामितिज्ञ हुए है जिन्होंने ज्यामिति ज्ञान को वैदिक यज्ञों की वेदियों के निर्माण के संदर्भ में विकसित किया था। उन्होंने शुल्ब सूत्रों के माध्सम से रेखा, पृष्ठ, मापन यन्त्र तथा मात्रक का अन्वेषण किया था। इनके द्वारा रचित शुल्ब साहित्य में मापन यन्त्र को रज्जु भी कहा गया है तथा कई स्थानों पर रेखा को रज्जु कहा गया है। ज्यामितिक साहित्य मूलतः ऋग्वेद से उत्पन्न हुआ है जिसके अनुसार अग्नि के तीन स्थान होते हैं- वृत्ताकार वेदी में गार्हपत्य, वर्गाकार में अंह्यान्या तथा अर्धवृत्ताकार में दक्षिणाग्नि। तीनों वेदियों में से प्रत्येक का क्षेत्रफल समान होता है। अतः वृत्त वर्ग एवं कर्णी वर्ग का ज्ञान भारत में ऋग्वेद काल में था। इन वेदियों के निर्माण के लिए भिन्न-भिन्न ज्यामितीय क्रियाओं का प्रयोग किया जाता था । जैसे किसी सरल रेखा पर वर्ग का निर्माण, वर्ग के कोणों एवं भुजाओं का स्पर्च्च करते हुए वृत्तों का निर्माण, वृत्त का दो गुणा करना इसके लिए इनका मान ज्ञात होना जरुरी था।

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