शंकरनारायण, उदय दिवाकर (१०७३ ई.), सूर्यदेव (११९१ ई.) ने भी प्रभाकर की टीका का उल्लेख किया है। सोमेच्च्वर ने अपनी टीका में श्लोकों की व्याख्या करते हुए, कई नए उदाहरण भी दिए हैं। आर्यभट के सिद्धान्तों की श्रेष्ठ व्याख्या सर्यदेव यज्व की टीका - आर्यभट प्रकाच्च अथवा आर्यभट प्रकाच्चिका में पाई जाती है। १५वीं शताब्दी के केरल के ज्योतिषाचार्य परमेच्च्वर ने सूर्यदेव की टीका का उपयोग करते हुए आर्यभटीय की संक्षिप्त परन्तु उत्तम व्याख्या अपनी टीका में प्रस्तुत की। नीलकंठ सोमयाजी (१५०० ई.) की टीका-महाकाव्य अपने ऐतिहासिक सन्दर्भों के साथ-साथ ज्योतिष में आद्यतन संच्चोधनों के लिए जानी जाती है। कर्नाटक के रघुनाथ राजा (१५९७ ई.), आन्ध्रप्रदेच्च के विरुपाक्ष के पुत्र माधव एवं भूतिविष्णु की टीकाएँ भी उल्लेखनीय हैं।
Friday, May 15, 2009
आर्यभटीय की संक्षिप्त परन्तु उत्तम व्याख्या अपनी टीका में प्रस्तुत की
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Wednesday, May 6, 2009
भास्कर-प्रथम के पूर्व प्रभाकर ने आर्यभटीय पर टीका लिखी थी
आर्यभटीय की लोकप्रियता एवं सम्पूर्ण भारत में उसकी बौद्धिक स्वीकृति का प्रमाण उस पर लिखी गई टीकाओं से मिलता है। कुछ प्रमुख टीकाओं की चर्चा नीचे की जा रही है -आर्यभटीय की टीकाएँ आर्यभटीय पर लिखी टीकाओं में सर्वाधिक प्रचलित एवं प्रसिद्ध टीका भास्कर प्रथम की महाभास्करीय हैं जो ६२९ ई. में लिखी गई। शंकर नारायण (८६९ ई.) ने इसकी प्रच्चस्ति में कहा, ÷आर्यभट के बारे में सब कुछ जानने की इच्छा रखनेवाले को यह टीका पढ़ना चाहिए।÷ भास्कर ने अपनी टीका में कई स्थान पर आचार्य प्रभाकर को उद्धृत किया है। इससे प्रतीत होता है कि भास्कर-प्रथम के पूर्व प्रभाकर ने आर्यभटीय पर टीका लिखी थी - जो अब उपलब्ध नहीं है।
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Friday, May 1, 2009
गीतिकापाद के १० श्लोक गीतिका छन्द में हैं
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Saturday, April 25, 2009
आर्यभट की रचनाएँ
कहा जाता है कि आर्यभट ने -आर्यभटीयआर्यभट सिद्धान्त, औरसूर्य सिद्धान्त प्रकाच्चनाम से तीन ग्र्रन्थों की रचना की थी। इसके अतिरिक्त अनेकों श्लोक उनके नाम से प्रचलित हैं। पर उनकी एकमात्र उपलब्ध कृति आर्यभटीय है - जिसके कारण उनका नाम भारतीय ज्योतिष और गणित के इतिहास में अमर है। आर्यभटीय - एक भव्य और मनोरम ग्रन्थ है। यह प्रथम पौरुषेय ज्योतिष ग्रन्थ के रुप में भी जाना जाता है। इसमें कुल १२१ श्लोक (पद) हैं। आर्यभटीय अपनी संक्षिप्त, सटीक और सूत्रात्मक अभिव्यक्ति के लिए प्रसिद्ध है। यह चार अध्यायों में विभाजित है -
गीतिकापाद - १३ श्लोक
गणितपाद - ३३ श्लोक
कालक्रियापाद - २५ श्लोक
गोलपाद - ५० श्लोक
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Wednesday, April 22, 2009
अल-बरुनी ने भी कुसुमपुर के आर्यभट का उल्लेख किया है।
यद्यपि आर्यभट ने अपने जन्मस्थान के बारे में कोई उल्लेख नहीं किया है, पर उन्होंने कुसुमपुर (पाटलिपुत्र या आधुनिक पटना) का उल्लेख करते हुए लिखा है -
आर्यभटस्त्विह निगदति कुसुमपुरेभ्यार्चित ज्ञानम्
(आर्यभट कुसुमपुर में अतिच्चयपूजित ज्ञान का वर्णन करता है)
अल-बरुनी ने भी कुसुमपुर के आर्यभट का उल्लेख किया है। इससे यह प्रतीत होता है कि आर्यभट कुसुमपुर में निवास करते थे। परमेच्च्वर (१४३१) ने 'कुसुमपुराख्येस्मिन्देच्चे' कहकर इसकी पुष्टि की है। भास्कर प्रथम और नीलकंठ के अनुसार आर्यभट अच्च्मक जनपदीय थे। नर्मदा और गोदावरी के मध्य के जनपद का अच्च्मक प्रदेच्च के रुप में उल्लेख-पाणिनि की अष्टाध्यायी, वाल्मीकि रामायण, महाभारत और वराहमिहिर की वृहत्संहिता में मिलता है। सम्भव है कि आर्यभट का जन्म दक्षिण भारत के अच्च्मक जनपद में हुआ हो और फिर वे कुसुमपुर (पाटलिपुत्र) में रहने लगे हों। अनेकविद्वानों का यह भी मानना है कि आर्यभट नालन्दा विच्च्वविद्यालय से कुलप (कुलपति) के रुप में सम्बद्ध थे।
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Tuesday, April 14, 2009
आर्यभट का जन्म और स्थान.....
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Sunday, April 12, 2009
पुनर्जागरण के सूत्रपात के साथ एक नए वैज्ञानिक युग का प्रारम्भ हो रहा था।
आर्यभट द्वारा की गई ग्र्रहण की व्याख्या भी परवर्ती ज्योतिषविदों द्वारा अस्वीकार कर दी गई। पृथ्वी के भ्रमण के उनके सिद्धान्त को गोविन्दस्वामी ने 'मिथ्या ज्ञान' कहा और वराहमिहिर ने 'भ्रमति भ्रमस्थितेव' कहते हुए उसे अग्राह्म कर दिया। यहीं नहीं अप्पय दीक्षित (१५३०-१६००) जैसे सुप्रसिद्ध व्याकरणाचार्य ने कहा - 'आर्यभटघभिमत् भूभ्रमणादिवादानां श्रुति न्याय विरोधेन हेयत्वात अर्थात् - पृथ्वी के भ्रमण सम्बन्धी आर्यभट के सिद्धान्त शास्त्रों के विरुद्ध हैं, अतः निन्दनीय है।जब भारत में अप्पयदीक्षित जैसे विद्वान आर्यभट के सिद्धान्तों को हेय बतला रहे थे तब उधर पच्च्िचम में पुनर्जागरण के सूत्रपात के साथ एक नए वैज्ञानिक युग का प्रारम्भ हो रहा था।
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